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वंगण संपलेल्या हाडांच्या सापळ्यांसोबत माळावरच्या छप्पराच्या बाहेर पिपरणीच्या झाडाखाली, 'लुकलुक हलणाऱ्या मानेला' सोबत घेवून तो म्हातारा सुकलेल्या हाताने काठी हलवत पडलेला दिसतो...
...रात्रीची स्वप्नात त्याला कधीतरी मरून गेलेली गावातली समदी जुनी माणसं मसनवटयातनं 'भसाभसा' वर येवून हाका मारताना दिसतात...
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साऱ्या मळयातील वस्तीला पहाटे बाग देवून जागं करणाऱ्या धुरपा काकुच्या 'किंग' असलेल्या कोबंड्याला मुंबईहुन आलेल्या क्रूर नातवानी रात्री धुलवडीला सोलुन कापून खाल्ला. त्याच्या बांधावर पडलेल्या मऊशार पिसांणा हातात घेवून मी कुरवाळीत बसलोय. विचार करीत...सकाळीच मुंबईकडे मार्गस्थ झालेल्या स्मार्ट आतंकवाद्यांचा...
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... तर तिकडे पलिकडे लिंबाच्या झाडाखाली एकेकाळी उन्हातान्हात नांगर धरलेला कळकट, मळकट, राकट हातांचा म्हातारा नाना, सुट्टीला आलेल्या आपल्या नातवाच्या हातातील स्मार्टफोनवर थरथरत्या बोटानी कॉन्व्हेंटमधील गॅदरिंगचे फ़ोटो पुढे ढकलत दोन पिढ्यातील अंतर मोजताना स्पष्ट दिसतोय...
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किड्या मुंग्याना सुद्धा पोट असतं म्हणून रात्री झोपताना आत उतरंडींला ठेवलेल्या गुळाच्या ढेपंतला एक खड़ा बाहेरच्या अंगणात खाण्यासाठी ठेवणारी प्रेमळ कमळानानी कुठे भेटणार आता पुन्हा...
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...तर खळखळत वाहणाऱ्या नदीच्या काठावर शांत बसून ती कपडे धुत आहे. परवा पस्तिशी ओलांडल्या पासून तर ती जास्तच अबोल झालीय. सहसा कोणात मिसळत नाही. "लग्न होवुच शकणार नाही का?" या एकाच प्रश्नाभोवती ती पाण्यातील भोवऱ्यासारखी गोल गोल फिरताना पुलावरून स्पष्ठ दिसतेय...
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तर तिकडे पलिकडे पांदीतून अण्णा एका हातात भाला आणि दुसऱ्या हातात धारंच्या किटल्या घेवून ओढ्याच्या वरच्या अंगाला असलेल्या वस्तीकडं चप्पलांचा कर्र कर्र आवाज करीत वेगाने अंधार कापीत जाताना अंधुकसा दिसतोय...
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तर लहानपणी चहा पावडरीच्या डब्यात बरेच दिवस साठवून ठेवलेले 'सुगंधी अकरा रुपये' शाळेच्या सहलीला जाताना आईने मला खर्चासाठी दिले होते.
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...तर तिकडे गावाकडे शेकारलेल्या मेंगलोरी कौलांच्या मातीच्या गळक्या घरात शंभरी ओलांडूनही बरेच दिवस जगलेली "बाळकू नानी" रात्रभर कोसळलेल्या पावसाने अखेर भिंतीखाली गाडली गेली. अन इकडे शहरात बसून पावसावर कविता लिहिन्याची माझी स्वप्ने क्षणात विरली...
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हे म्हातारे...अजुन किती दिवस चालणार आहे, तुझ्या जीर्ण झालेल्या देहाच्या यंत्राची जीवघेणी खडखड. आता गुंडळ सगळं आणि जा जळून गावाबाहेरच्या मसनवटयात तडतडत...
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तर लहान असताना शेताकडून घरी जाताना बंडा तात्याच्या थकलेल्या म्हशिसाठी एक बिंडा बांधावरच गवत कापून दिलं म्हणून, त्यानी माझ्या सायकलीसाठी एक सेकंड हैन्ड टायरआठवडी बाजारातून आणून दिला ….
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लहानपणी आज्जी रात्रीच्या लख्ख चांदण्याच्या प्रकाशात अंगणात बसून 'हुमनं' घालायची --
"लाल पालखी, हिरवा दांडा,
आत बसल्या, बोडक्या रांडा".
मग आम्ही मोठ्याने ओरडायचो...
"मिररररची"!!!
.....आता आज्जीची पण माती झाली अन डिजिटल इंडियात 'हुमनं' पण जळून खाक झाली....

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तर...
दोन पोरींची लग्नं पार पाडल्यावर परवा तिसऱ्या पोरीचं लग्न ठरल्यावर रातभर डोळं उघडं ठेवून झोपलेला नवरा बघून, सकाळी मंगलाबाईनं जुन्या लाकडी पेटीतून कापडात बांधलेला पितळेचा डबा काढला. अन सोफ्यात भिताडाला टेकून बसलेल्या मेलेल्या नवऱ्याला जिवंत करत ती एवढच म्हणाली, "आयनं केलेल्या या तीन तोळ्याच्या पाटल्या हायत्या! उठा अन पेठत जाऊन मोडा..." 
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तर...
नवीन लग्न झालेल्या लेकाला सुनेजवळ सोबतीला ठेवून, चावणाऱ्या थंडीला अंगावर कांबळी टाकून झेलत आणि शेपुट हलवणारा पांढरा कुत्रा सोबतीला घेवून आताच खालच्या आळीतला नाना पांदीतून मळ्याकडं शाळवाला पाणी पाजण्यासाठी अंधाराला कापीत निघून गेला... 
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तर...
खेड्यापाड्यातून धुरळा उडवीत नागमोडी वळणे घेत ऊन वारा पचवणारी ती जुनी सडकही आता बदलली, तिच्या अंगाखांद्यावर बैलगाडी ऐवजी चारचाकी धावू लागली, वाट सुकर झाली, पण वस्तीवर वडाच्या सावलीत गुळ शेंगा खाऊन मातीच्या रांजणातील पाणी प्यायची वाट मात्र खुंटली...  
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तर...
ऐकुलत्या एका पोराच्या ऑपरेशनच्या खर्चासाठी जेव्हा गोठ्यातली गाभ गेलेली म्हैसच विकायची वेळ आली तेव्हा साखरुबाई भाकरीच्या बुट्टीतली अर्धी भाकरी हातात घेवून भरल्या डोळ्यानं नवऱ्याच्या हातात देत एवढच म्हणाली, "एवढा घास रंगीच्या तोंडात घाला अन मगच तिचं दावं सोडा"... 
 
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तर...
एखदा सायंकाळी रानातून ओढ्याच्या काठाने घरी निघालेल्या हौसा म्हातारीच्या डोक्यावरचा वैरणीचा बिंडा मी माझ्या बावीस इंची सायकवरुन आणून तिच्या वस्तीवर टाकला, तर घरी आल्या आल्या तिनं माझ्या गालांना एक "ओला मुका" गिफ्ट म्हणून दिला... 
 
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तर...
माकडाच्या पिलागत काखेला चिकटलेलं बारकं पोरगं घेवून हौसाबाई सकाळी छप्परातील चार फुट उंचीच्या पत्र्याच्या दारातनं वाकुन गडबडीनं बाहेर आली. आणि जीवापाड सांभाळून व्यायला झालेली म्हैस एकाएकी तोंडाला फेस येवून शेणात मरून पडलेली बघुन वस्तीवर साऱ्या घरादारानं पोरांच्या तोंडचा घास पळाला म्हणून एकच हंबरडा फोडला...
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तर...
पदराला दोन चिमुकली पोरं असतानाही प्रियकराच्या नादाला लागून रात्री संसाराच्या जीवघेण्या काळजीत झोपलेल्या नवऱ्याच्या डोक्यात हातोडा घालून, लहान चिमुरड्याना एका दिवसात रस्त्यावर आणणाऱ्या असल्या बायकांना आणि त्यांना जाळ्यात ओढणाऱ्या तरुण पोरांना जेलमध्ये घालण्याऐवजी रोज तासभर भर चौकात उलटं टांगून ऊसातील शेवरीच्या दांडक्याने नडग्या नडग्या ठोकून काढल्या पाहिजेत...
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तर...

आमच्या कॉलेजच्या काळात सकाळी एस. टी. तुन जाताना "तिनं" नुसती मान वळवून नजरेची झलक जरी दिली तरी नुसत्या त्या आठवणीवर बेभान होवून आम्ही दुपारी रानात गेल्यावर गाडीभर "मूग" उपटायचो. अर्धा एकर "हायब्रीड" बेडग्यानं दिवस मावळायच्या आत आडवं पाडायचो. ती मजा आताच्या डिजिटल प्रेमप्रकरणात अजिबात उरली नाही. सकाळी यांची व्हाट्सआप वरुन फ्रेंडशिप होणार. दुपारी प्रेम होणार अन रात्री तिला "तसला विडियो" पाठवून दोन दिवसात ब्रूम ब्रूम बाईक वरुन तिला कुठल्यातरी गार्डन मध्ये नेवून यांच्या कार्यक्रमाचं थाटामाटात उद्घाटन होणार. म्हणून कॉलेजची प्रेमे म्हणजे तात्पुरती ऐट असते. तात्पुरता डामडौल असतो. पुढे प्रेमे उडून जातात. कोणाची कुठेतरी लग्ने होतात. आणि तिकडे विसरून गेलेल्या आपल्याच प्रेयसीला दुसऱ्याच कोणाकडून तरी तितकीच गोजिरवाणी पोरंबाळं होत राहतात...
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तर...

गेले कित्येक दिवस अंथरुणाला खिळून राहिलेल्या तिच्या जीर्ण देहातुन अखेर आज हवा निघुन गेली. आणि दोन दिवसापासून बंद असलेली तिच्या घरातील पोफडे उडालेली चुल आज पेटली. पलिकडे तिला शेवटची आंघोळ घालण्यासाठी चुलिवरच्या जर्मनच्या मोठ्या पातेल्याला बायका ढणा ढणा जाळ घालताना दिसतायेत...
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तर...

गेली कित्येक वर्षे लग्नाच्या पंक्तीत पत्रावळ्या, दुराण, शेक, भात वाढून झाल्यावर सगळ्यात शेवटच्या पंक्तीत तो कधीतरी जेवायला बसतो. आणि पलीकडे एकमेकांना लाडू भरवणाऱ्या नवरा नवरीकडं बघत आपलं पण असच लगीन होईल का? या आशेवर पन्नाशी उलटून गेल्यानंतरही तो अजून जगताना दिसतो...
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तर...

त्या बंगल्यातल्या गौरींच्या पुढे मांडलेल्या विविध पदार्थांच्या डिशेश दारातून वाकून
बघत बाजूच्या अंधाऱ्या झोपडीत शिरलेला तो फाटक्या चड्डीतला उघडा चिमुकला आईला जावून म्हणाला, "आयं आपल्या घरात का गं येत नाहीत तसल्या गौरी"?
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"असं कसं नको म्हणताय काकी? तुमचा बी संसार हायच की. ठीवून घ्या ही दोन पायल्या ज्वारी! लईच नड हाय! पोरीचा एस.टी चा पास संपलाय".

असं म्हणत ज्वारीचं गठुळं दारात ठेवून त्याबदली दीडशे रुपये घेवून 9.30 च्या एस.टी ने कॉलेजात निघालेल्या आपल्या लाडक्या लेकीला देण्यासाठी, आताच रकमाबाई पुढच्या बोळातून गड़बडीनं घराकडं गेली...
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रात्रीपासून फोर जीच्या डोक्याच्या वरुन पळणाऱ्या बातम्या ऐकून ऐकून सकाळी मळ्यात हिरीच्या डगरटीवर बसलेल्या पांडुतात्याला खालच्या आळीतला गवत कापायला निघालेला नाना धावत धावत येवून म्हणाला, "तात्या शेतकऱ्यांचाबी फायदा हाय म्हंणतायेत? ते कसा वं?"...

...तोंडातल्या तंबाकूची पिचकारीे टाकत खाली हिरितल्या मोटारीकडं बोट दाखवत पांडुतात्या एवढच म्हणाला, "ते कार्ड आणून खाली मोटरला बांधलं की मग चार पट वेगानं तिकडं चेंबर वावरात पाणी फेकणार".
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तर...

लहान आसताना एखदा आयनं वरीसभर खिंडारातल्या दगडांच्या चिरेत साठवलेले केस गोळा करुन भंगारवाल्याला नेवून घातलं...
अन रात्री दहा बारा फुग्यांची माळ करुण आपण नुसताच पोरासनी गुळ वाटून झोकात वाढदिवस साजरा केला.
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तर...

तिच्या घरी कोणीच पुरुषमाणूस नाही. पदराला मुलबाळ नाही. खणभर घरात भुंडं कपाळ घेवून ती एकटीच वावरते. सोबतीला गोटयातल्या चार म्हशी. कशान मेला, कसा मेला यातलं नवऱ्याबद्दलचं तिला काहीच माहीत नाही. मध्यंतरी तिनं दत्तक घेतलेल मूल पण मेलं. तेव्हापासून माणसांशी असलेलं नातं तिनं कायमचं तोडलय. रात्री तिच्या गोठ्यातला कंदील बराच वेळ पेटता होता. उशिरापर्यन्त माणसांतली वासनांध झालेली भुतं तिच्या घराभोवती वावरत राहतात. कधी कधी तिच्या घराच्या पत्र्यावर दगडांचा आवाज होत राहतो. मग उसळू पाहणाऱ्या काळजाला घट्ट दाबून धरत ती न सरणारी रात्र ढकलत राहते...
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तर...

दोन वेळा शिवा गंवडयाचा रेडा दाखवूनही उलाटलेली वरच्या आळीतल्या आण्णाची म्हैस अखेर तिसऱ्यांदा गाभन गेली. आणि आता तिचं दिवस भरलेत म्हणून वृद्ध आण्णानं तिकडच वस्तीवरच्या छप्परात मागच्या आठवड्यांपासुन मुक्काम ठोकलाय. म्हाताऱ्याच्या काळजीनं म्हातारी रोज रात्री भाकरीचं गठुळं बांधून हातातील बॅटरीच्या उजेडात ओढ्याच्या कडेने अंधारातून रोज सुना लवकर चुल पेटवत नाहीत म्हणून शिव्या घालत चालत जाताना दिसते.
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तर...

तिकडे पलीकडे बऱ्याच वर्षानी मुंबईत आयुष्य वेचून रिटायर झालेला एकुलता एक भाऊ रक्षा बंधनासाठी गावी येणार आहे म्हणून दुपार पासून मंगलाबाई दोन वेळा सुपात शेवाळ्या घेवून घराच्या बाहेर पाखड़ताना दिसलीय. तसं सकाळपासूनच भावाचं गुणगाण साऱ्या वस्तीला सांगूनही झालय. पण दिवस बुडाल्यापासून मंगलाबाईची तगमग खुप वाढत गेलीय. दुपारी येणारा भाऊ संध्याकाळ झाली तरी अजुन वस्ती पर्यन्त काय पोहचलाच नाही. सहाची एस.टी कधीच धुरला उडवित निघून गेलीय. आता शेवटच्या साडेआठच्या गाडीनं तरी भाऊ येईल या आशेने ती सारखी बाहेर येवून पांदीकडे डोळे लावताना अंधारातुन स्पष्ट दिसतेय...
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तर...
"माझ्या पतीने बंगला बांधिला

त्या बंगल्याची हवा गं!
त्या बंगल्याला रंग चढिला
हिरवा, पिवळा, लाल गं!"
कधीकाळी पंचीमीला ती आली की नागपंचमीची गाणी म्हणत सारा आसमंत दणाणून सोडायची. वडाच्या झाडावर दिवसभर झोके घेत आणि देत बसायची. सायंकाळी फुगड्यानी साऱ्या वाड्यापुढचं पटांगण ती हादरवून सोडायची. माहेरी आलेल्या मैत्रीणीसोबत घरभर खेळायची. शिरळोबाच्या पुढं ऐकवली गेलेली शिराळशेटची कथा संभळालाच्या तालावर रात्रभर ऐकत बसायची...

... आता खुप दिवस झाले ती माहेरीच असते. पोरगी नांदत नाही हा आईबापावर ठपका पडेल म्हणून बरेच दिवस सासरी सोसत राहीली. कधी कधी अंगणात सापळ्यासहीत भांडी घासत बसलेली दिसते. जनावरांचं शेणघाण, वैरणकाडी करुन आणि शेतात राबून पार मोडून गेलीय. पालीसारखी पांढरी झालीय. सकाळपासून वाडयाच्या बाहेर तेज जावून शिल्लक राहिलेल्या डोळ्यांच्या बुबळांना घेवून हताशपणे बसलीय. कधीतरी झोके घेत म्हंटली गेलेली पंचीमीची गाणी आठवत...
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तर...

शंभर वर्षे जगूण झाल्यावर तो म्हणाला, "मला इच्छामरण दया आता! थकून गेलेत माझे सांगाडे! जीर्ण झालेल्या माझ्या देहाच्या सापळ्याला कायमचा निरोप दया आता?" त्याच्या रोजच्याच हाका ऐकून रात्री सावित्री क्षणभर थांबली अन हसून त्याला म्हणाली, "वेड्या तुझ्या हाका ऐकायला इथे वेळ आहे कुणाला? जोपर्यन्त तुझी ब्रेकिंग न्यूज होत नाही ना! तोपर्यन्त तूझी हाक कुणाच्याच् कानात शिरणार नाही? थांब मीच धड़क मारते तुला?" मग तिच्या एकाच धडकेत घराकडे धावणारे कित्येक निरागस जीव तिने रात्रीच्या अंधारात पोटात घेतले. अन कित्येक वर्षे ऐसीत बसून कागदी घोड़े नाचवणारे मेंदू सांत्वन करायला खड़बडून जागे झाले...
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तर...

लॅन्ड होताना विमानाने जशी अलगद आपली चाके बाहेर सोडावीत अगदी तसेच त्या तरुण सुंदर स्त्रीने डेक्कन कॉर्नरच्या चौकातल्या सिमेंटच्या रस्त्यावर स्कूटीवरुन टर्न मारताना, आपले दोन्ही पाय घसरत बाहेर सोडले अन दणकन घसरुन आपटली...
...मी तिची गडबडीनं गाड़ी उचलली अन त्या तरुण सुंदर चेहऱ्याकडे वळून विचारले, "मावशी लागलं का हो तुम्हाला?" तर त्या तरुण बाई एवढच म्हणाल्या, "मी तुम्हाला मावशीसारखी दिसतेय का हो???"
बोला आता...
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तर...

थकलेल्या नास्तिक म्हाताऱ्याला सोबत घेवून खांद्यावर पांडूरंगाची पताका फड़कवत आळंदीपासून वारीतनं म्हातारी पाठीवर गठुळ्यात पीठ मीठ बांधून पंढरीला कधीतरी बिन चप्पलांची चालत गेली. म्हाताऱ्याला चंद्रभागेत बुडवून काढून दोन दिवस रांगेत उभा करुन विठ्ठलाच्या गाभाऱ्यात मूर्तीपुढं आल्यावर म्हातारी हात जोडून "आता नातू हुंदे बाबा लेकीला!" एवढ़च म्हणाली. पुढं सहा महिन्यानी लेकीला पोरगा झाला अन म्हातारीनं हरकुन नाव ठेवलं, "ज्ञानदेव"...
...तर असो प्रत्येक नावाच्या मागं ही म्हातारी माणसं लपलेली असतात. पण ती आपली जगण्याची प्रेरणा असतात.
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तर...

ओढयात जळनासाठी लाकडं गोळा करताना झाडीत दबा धरून बसलेल्या खालच्या आळीतल्या राशन दुकादारानं तिच्यावर लांडग्यासारखी झडप मारली तसं घरादाराचं राशन बंद होईल या भितीनं ती काही काळ मुडदयासारखी तशीच पडून राहली. मग पातळाच्या निऱ्या झाडत जळनाचा बिंडा घेवून घराकडं आली अन दिव्याच्या मिनमिनत्या उजेडात चुलीवर भाकऱ्या थापताना निघणाऱ्या जीवघेण्या धुरात नशीबाला शिव्या घालत तिनं प्रचंड प्रचंड रडून घेतलं...
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तर...
रात्री डुलकी लागता लागता तो अंधारातून अचानकच उठला. उशाला ठेवलेला दिवा पेटवला. धुरपीच्या शाळेच्या मळकट कापडी पिशवीतला मोड़का पेन काढून हातात घेतला. अन छप्पराच्या कुडाला अडकवलेल्या कॅलेंडरमधल्या 25 तारखेच्या चौकोणात "म्हैस फळाली" असे ठळक अक्षरात लिहून, पुन्हा दिव्यावर फुंकर मारून पोराबाळाना पुढच्या साली दूध खायला मिळणार या विचारात तो झोपी गेला....
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तर...
त्या दूर उजाड़ माळरानावरच्या रणरणत्या उन्हात एक म्हातारी संध्याकाळी 'तिन दगडाची चुल' पेटवण्यासाठी जळनाच्या वाळलेल्या काटक्या वेचताना दिसत आहे. तिच्या बाजूला एक कुत्र शेपुट हलवतय फिरतय.
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तर...

तिकडे पलिकडच्या रस्त्याने जन्मापासूनच गरीबीत खोल रुतलेला वस्तीवरचा नाना गावातल्या गिरणीतनं बऱ्याच दिवसानी गव्हाचे दळन दळून डोक्यावर कापडी पिशवीचं गाठोडं घेवून निघालाय. डाव्या हातात तेलाची किटली पण दिसतेय. रस्त्याने येणाऱ्या जाणार्यांची आपुलकिने विचारपुस करतोय. नानाच्या म्हातारीला माहेरातल्या शेजारणीने काल येताना चार आंबे पिशवीत टाकुन दिलेत. बहुतेक आज आमरसाचा कार्यक्रम दिसतोय. गरीबीमुळे वर्षातील एक दोन वेळच नानाला असे गोड धोड खायला मिळते. पण यावर सुद्धा तो खुप समाधानी असतो. म्हणूनच तो मला नेहमी आभाळा एवढा मोठा वाटतो...
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आताच आठवडी बाजारातून रसत्यावरचा लाल धुरळा उडवित आलेल्या एस.टी तून उतरून डोक्यावर जड पिशव्या घेवून, झपाझपा गावात चालत निघालेल्या शेवंता म्हातारीला मी गाडीवर बसवून गावातल्या तिच्या पडक्या घरासमोर आणून सोडली तर हिनं उतारल्या उतारल्या मला घरातले पिशवी भरून आंबे आणून दिले...
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...कधीतरी पुण्यात घेतलेली नऊशे रूपायांची तीन डझनाची पेटी मघापासून सारखी डोळ्यासमोर येतेय. असला आर्थिक हिशोब ही गावाकड़ची पडक्या घरात राहणारी म्हातारी माणसं का बरे करत नसावीत...
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म्हणून...

गेल्या कित्येक वर्षापासून पारुबाईच्या दारात कधीच गुढी उभी राहत नाही,
दारात शेणाचा सडा पडत नाही,
पांढऱ्या रांगोळीच्या रेषा अंगणात उमटत नाहीत, परसातल्या लिंबाची फांदी तोडली जात नाही आणि कोपऱ्यातल्या चुलीवर रटारटा डाळ शिजल्याचा आवाजही होत नाही...
...काधीकाळी म्हणे पाडव्याच्याच दिवशी तिचा धणी दिवस उगवाच्या आत ओढयात बांबूच्या बेटात गुढीसाठी बांबू तोडायला गेलेला. आणि पायाला साप चावून गुढी उभी न करताच विझलेला...
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तर...

साऱ्या मळयातील वस्तीला पहाटे बाग देवून जागं करणाऱ्या धुरपा काकुच्या 'किंग' असलेल्या कोबंड्याला मुंबईहुन आलेल्या क्रूर नातवानी रात्री सोलुन कापून खाल्ला.
त्याच्या बांधावर पडलेल्या मऊशार पिसांणा हातात घेवून मी कुरवाळीत बसलोय.
विचार करीत...
सकाळीच मुंबईकडे मार्गस्थ
झालेल्या स्मार्टआतंकवाद्यांचा... 
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